ज़िंदगी हो या टेक्नॉलजी
की दुनिया, ग़लतफहमियों का बोलबाला हर जगह है। दौड़-भाग के इस दौर में हमारा आमना-सामना अक़्सर
ऐसी बातों से भी होता है, जो सच नहीं होतीं लेकिन बड़े भरोसे के साथ कही गई होती हैं। टेक्नॉलजी भी इससे
अछूती नहीं है। हमारे दोस्त, परिजन, अज़नबी कई बार हमें ऐसा कुछ बता देते हैं, जिसकी पड़ताल किए बिना ही हम उसे सच मानने लगते हैं। ऐसे में कई बार हमें नुक़सान
तो उठाना पड़ता ही है, साथ ही एक ग़लत जानकारी को हम आगे भी बढ़ा रहे होते हैं।
उदाहरण के लिए कैमरे
का चुनाव करना हो तो हम मेगापिक्सल गिनने लग जाते हैं। प्राइवेट ब्राउज़िंग की बात
हो तो इनकॉग्निटो पर 'आंख मूंद कर' भरोसा करने लगते हैं। ज़ाहिर सी बात है, हर एक बात का प्रमाणन करने के लिए ना तो हमारे पास इतना वक़्त होता है और ना ही
इतनी तवज्जो। आज हम बात करते है कुछ ऐसी प्रसिद्ध ग़लतफहमियों के बारे में।
ज़्यादा खंभे मतलब
ज़्यादा सिग्नल
आपके फ़ोन के ऊपरी
हिस्से में दायीं या बायीं ओर सिग्नल के डंडे होते हैं। ऐसा मान लिया गया है कि ये
जितने ज़्यादा होंगे, सिग्नल कनेक्टिविटी उतनी ही मज़बूत होगी। दरअसल, ये डंडे आपके फ़ोन की नज़दीकी टावर से निकटता दिखाते हैं। ऐसे में इन्हें यह बिलकुल
ना समझें कि पूरी डंडे आने पर आपके फ़ोन का सिग्नल बिंदास काम कर रहा है।
चुपके से करना है ब्राउज़
तो खोलो इनकॉग्निटो
यह अफ़वाह भी टेक्नोलॉजी
का इस्तेमाल करने वालों के बीच है कि इनकॉग्निटो विंडो सबसे सुरक्षित विकल्प है। हर
ब्राउज़र में एक प्राइवेट विंडो का विकल्प रहता है। दरअसल, सच यह है कि आप इस
विंडो में जितनी भी साइट को विजिट कर रहे हैं, आपका ब्यौरा आपके इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और साइट से छिपा नहीं सकते। इस बात
को अपने दिमाग से निकाल दें कि आप इनकॉग्निटो पर कुछ भी विजिट करेंगे तो वह सिर्फ़
आपके और आपके कम्प्यूटर के बीच रहेगा। गूगल क्रोम पर आप इनकॉग्निटो को सीधे CTRL + SHIFT + N से खोल सकते हैं। वहीं, इंटरनेट एक्सप्लोरर, सफारी पर इसके लिए आपको CTRL + SHIFT
+ P दबाना होगा। मैक के लिए यह शॉर्टकट CTRL + OPTION + P होगा।
मेगापिक्सल ज़्यादा
तो कैमरा होगा मस्त
इस मिथ को समझने के
लिए आपको समझना होगा पिक्सल क्या होता है? दरअसल, कोई भी तस्वीर छोटे-छोटे डॉट से मिलकर बनती है, जिन्हें पिक्सल कहा जाता है। इनसे मिलकर ही तस्वीर तैयार होती
है। ये पिक्सल हज़ारों-लाखों छोटे-छोटे डॉट से बनते हैं, जो आम तौर पर आपको
फ़ोटो में नज़र नहीं आते। मेगापिक्सल काम के हैं लेकिन आपके कैमरे की क्वालिटी तय होती
है कैमरा लेंस, लाइट सेंसर, इमेज प्रोसेसिंग हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर की जुगलबंदी से। उदाहरण के लिए आईफ़ोन
6, जो 8 मेगापिक्सल कैमरे
के साथ आता है और बाज़ार में मौज़ूद कई 13 मेगापिक्सल कैमरे वाले फ़ोन को मात दे देता
है। फ़ोन में अतिरिक्त मेगापिक्सल सिर्फ़ आपकी प्रिंट की गई तस्वीर में सहायक हो सकते
हैं। यहाँ एक बात और साफ कर दें कि कोई भी फ़ोन कैमरा, कभी भी डीएसएलआर की
कमी पूरी नहीं कर सकता।
प्रोसेसर हो ज़्यादा
कोर वाला
मल्टी कोर प्रोसेसर
आपके फ़ोन के कामों को एक-दूसरे में बाँट देते हैं, जिससे टास्क ज़ल्दी संभव हो। डुअल कोर, ऑक्टा कोर, क्वाड कोर किसी भी
सीपीयू में वे प्रोसेसर की संख्या बयाँ करते हैं। डुअल मतलब 2, ऑक्टा का अर्थ 8 और
क्वाड का आशय 4 होता है। क्वाड कोर प्रोसेसर सिंगल और डुअल कोर प्रोसेसर से उसी दशा
में तेज़ हो सकता है, जब उसे दिए गए काम उसकी क्षमताओं से मेल खाते हों। कुछ ऐप ख़ास तौर से सिंगल या
डुअल कोर प्रोसेसर पर चलने के लिए बने होते हैं। ये अतिरिक्त पावर वहन नहीं कर पाते।
साथ ही अतिरिक्त कोर से यूज़र अनुभव में कोई सुधार नहीं आता। उदाहरण के लिए ऑक्टा कोर
प्रोसेसर पर चल रहे एचडी वीडियो की गुणवत्ता फ़ोन के इंटीग्रेटेड ग्राफिक्स की वजह
से भी बिगड़ सकती है। इसलिए क्लॉक स्पीड और प्रोसेसर की संख्या 'रामबाण' इलाज है, ऐसा कहना ग़लत होगा।
इसलिए ही आईफ़ोन उन कुछ फ़ोन से बेहतर प्रदर्शन करते पाए गए, जिनमें डुअल या ज़्यादा
कोर इस्तेमाल हुए थे।
ऐप्पल के सिस्टम में
वायरस नहीं आता
संभव है कि आपने भी
कभी अपने ऐप्पल डिवाइस रखने वाले दोस्त से सुना हो - इसमें वायरस कभी आ ही नहीं सकता।
दरअसल, दुनिया में ऐसा शायद ही कोई सिस्टम बना है जिसमें वायरस का प्रवेश ना हो सकता
हो। इतना ज़रूर है कि ऐप्पल के मैक कंप्यूटर का बाकी विंडोज़ पीसी के मुक़ाबले ट्रैक
रिकॉर्ड अच्छा है। इसका एक कारण यह भी है कि मैक से ज़्यादा संख्या विंडोज़ पीसी की
रही है।




